Sbg 16.11 htshg
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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।16.11।।तथा --, जिसकी इयत्ता न जानी जा सके? ऐसी अपरिमेय -- अपार? प्रलयतक -- मरणपर्यन्त रहनेवाली चिन्ताके आश्रित हुए? अर्थात् सदा चिन्ताग्रस्त हुए? तथा कामोपभोगके परायण -- जिनकी कामना की जाय वे शब्दादि विषय काम हैं? उनके उपभोगमें तत्पर हुए -- तथा विषयोंका उपभोग करना? बस यही परम पुरुषार्थ है? ऐसा निश्चय रखनेवाले।