Sbg 16.10 htshg
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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।16.10।।तथा वे --, कभी पूर्ण न की जा सकनेवाली दुष्पूर कामनाका -- इच्छाविशेषका आश्रय -- अवलम्बन कर? पाखण्ड? मान और मदसे युक्त हुए? अशुद्धाचारी -- जिनके आचरण बहुत ही बुरे हैं ऐसे मनुष्य? मोहसे -- अज्ञानसे मिथ्या आग्रहोंको? अर्थात् अशुभ सिद्धान्तोंको ग्रहण करके -- स्वीकार करके संसारमें बर्तते हैं।