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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।15.7।।उ 0 -- उसमें जो कारण है वह सुन --, जीवलोकमें अर्थात् संसारमें? जो जीवरूप शक्ति? भोक्ता? कर्ता इत्यादि नामोंसे प्रसिद्ध है? वह मुझ परमात्माका ही सनातन अंश है? अर्थात् अंग? भाग? एकदेश जो भी कुछ कहो? एक ही अभिप्राय है। जैसे जलमें प्रतीत होनेवाला सूर्यका अंश -- प्रतिबिम्ब? जलरूप निमित्तका नाश होनेपर? सूर्यको ही प्राप्त होकर फिर नहीं लौटता? वैसे ही उस परमात्माका यह अंश भी? उस परमात्मासे ही संयुक्त हो जाता है। फिर नहीं लौटता। अथवा जैसे घट आदि उपाधिसे परिच्छिन्न घटादिका आकाश? आकाशका ही अंश है और वह घट आदि निमित्तके नाश होनेपर? आकाशको ही प्राप्त होकर फिर नहीं लौटता? वैसे ही इसके विषयमें भी समझना चाहिये। सुतरां जहाँ जाकर नहीं लौटते यह कहना उचित ही है। पू 0 -- अवयवरहित परमात्माका अवयव? एकदेश अथवा अंश? कैसे हो सकता है और यदि उसे अवयवयुक्त मानें? तो उन अवयवोंका विभाग होनेसे परमात्माके नाशका प्रसङ्ग आ जायगा। उ 0 -- यह दोष नहीं है क्योंकि अविद्याकृत उपाधिसे परिच्छिन्न? एकदेश ही अंशकी भाँति माना गया है। यह बात क्षेत्राध्यायमें विस्तारपूर्वकर दिखलायी गयी है। वह मेरा अंशरूप माना हुआ जीव? संसारमें कैसे आता है और कैसे शरीर छोड़कर जाता है? सो बतलाते हैं -- ( यह जीवात्मा ) मन जिनमें छठा है? ऐसी कर्णछिद्रादि अपनेअपने गोलकरूप प्रकृतियोंमें स्थित हुई? श्रोत्रादि इन्द्रियोंको आकर्षित करता है।
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