Sbg 15.6 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।15.6।।वही पद फिर अन्य विशेषणोंसे बतलाया जाता है --, तत् शब्दका आगेवाले -- व्यवधानयुक्त धाम शब्दके साथ सम्बन्ध है। उस तेजोमय धामको यानी परमपदको? सूर्य -- आदित्य सबको प्रकाशित करनेकी शक्तिवाला होनेपर भी प्रकाशित नहीं कर सकता। वैसे ही शशाङ्क -- चन्द्रमा और पावक -- अग्नि भी प्रकाशित नहीं कर सकता। जिस परमधामको यानी वैष्णवपदको पाकर मनुष्य पीछे नहीं लौटते और जिसको सूर्यादि ज्योतियाँ प्रकाशित नहीं कर सकतीं? वह मुझ विष्णुका परमधाम -- पद है। पू 0 -- जहाँ जाकर फिर नहीं लौटते यह बात कही गयी। परंतु सभी गतियाँ? अन्तमें पुनरागमनयुक्त होती हैं और सभी संयोग अन्तमें वियोगवाले होते हैं? यह बात प्रसिद्ध है। फिर यह बात कैसे कही जाती है कि उस धामको प्राप्त हुए पुरुषोंका पुनरागमन नहीं होता