Sbg 15.17 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।15.17।।तथा जो क्षर और अक्षर -- इन दोनोंसे विलक्षण है? और क्षरअक्षररूप दोनों उपाधियोंके दोषसे रहित है वह नित्य? शुद्ध? बुद्ध और मुक्तस्वभाववाला --, उत्तमअतिशय उत्कृष्ट पुरुष तो अन्य ही है। अर्थात् इन दोनोंसे अत्यन्त विलक्षण है? जो कि परमात्मा नामसे कहा गया है। वह ईश्वर अविद्याजनित शरीरादि आत्माओंकी अपेक्षा पर है और सब प्राणियोंका आत्मा यानी अन्तरात्मा है इस कारण वैदान्तवाक्योंमें वह परमात्मा नामसे कहा गया है। उसीका विशेषरूपसे निरूपण करते हैं -- जो पृथ्वी? अन्तरिक्ष और स्वर्ग -- इन तीनों लोकोंको? अपने चैतन्यबलकी शक्तिसे उनमें प्रविष्ट होकर? केवल स्वरूपसत्तामात्रसे उनको धारण करता है और जो अविनाशी ईश्वर है? अर्थात् जिसका कभी नाश न हो? ऐसा नारायण नामक सर्वज्ञ और सबका शासन करनेवाला है।