Sbg 14.7 htshg
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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।14.7।।अप्राप्त वस्तुकी अभिलाषाका नाम तृष्णा है और प्राप्त विषयोंमें मनकी प्रीतिरूप स्नेहका नाम आसक्ति है? इन तृष्णा और आसक्तिकी उत्पत्तिके कारणरूप रजोगुणको रागात्मक जान। अर्थात् गेरू आदि रंगोंकी भाँति ( पुरुषको विषयोंके साथ ) उनमें आसक्त करके तद्रूप करनेवाला होनेसे? इसको तू रागरूप समझ। हे कुन्तीपुत्र वह रजोगुण? इस शरीरधारी क्षेत्रज्ञको कर्मासक्तिसे बाँधता है। दृष्ट और अदृष्ट फल देनेवाले जो कर्म हैं उनमें आसक्ति -- तत्परताका नाम कर्मासक्ति है? उसके द्वारा बाँधता है।