Sbg 14.6 htshg

From IKS BHU
Jump to navigation Jump to search

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।14.6।।उन सत्त्व आदि तीन गुणोंमेंसे पहले? सत्त्वगुणका लक्षण बतलाया जाता है -- सत्त्वगुण स्फटिकमणिकी भाँति निर्मल होनेके कारण? प्रकाशशील और उपद्रवरहित है ( तो भी ) वह बाँधता है। कैसे बाँधता है सुखकी आसक्तिसे। (वास्तवमें ) विषयरूप सुखका विषयी आत्माके साथ मैं सुखी हूँ इस प्रकार सम्बन्ध जो़ड़ देना यह आत्माको मिथ्या ही सुखमें नियुक्त कर देना है। यही अविद्या है। क्योंकि विषयके धर्म विषयीके ( कभी ) नहीं होते और इच्छासे लेकर धृतिपर्यन्त सब धर्म विषयरूप क्षेत्रके ही हैं -- ऐसा भगवान्ने कहा है। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि जो आरोपितभावसे आत्माकी स्वकीय धर्मरूपा हो रही है और विषयविषयीका अज्ञान ही जिसका स्वरूप है? ऐसी अविद्याद्वारा ही सत्त्वगुण अनात्मस्वरूप सुखमें ( आत्माको ) मानो,नियुक्त -- आसक्त कर देता है? यानी जो ( वास्तवमें ) सुखके सम्बन्धसे रहित है? उसे सुखीसा कर देता है। इसी प्रकार ( यह सत्त्वगुण उसे ) ज्ञानके सङ्गसे भी ( बाँधता है )। ज्ञान भी सुखका साथी होनेके कारण? क्षेत्र अर्थात् अन्तःकरणका ही धर्म है? आत्माका नहीं -- क्योंकि आत्माका धर्म मान लेनेपर उसमें आसक्त होना और उसका बाँधना नहीं बन सकता। इसलिये हे निष्पाप अर्थात् व्यसनदोष -- रहित अर्जुन सुखकी भाँति ही ज्ञान आदिके सङ्ग को भी ( बन्धन करनेवाला ) समझना चाहिये।