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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।14.23।।अब? गुणातीत पुरुष किस प्रकारके आचरणवाला होता है? इस प्रश्नका उत्तर देते हैं --, उदासीनकी भाँति स्थित हुआ? अर्थात् जैसे उदासीन पुरुष किसीका पक्ष नहीं लेता? उसी भावसे गुणातीत होनेके उपायरूप मार्गमें स्थित हुआ जो आत्मज्ञानी -- संन्यासी? गुणोंद्वारा विवेकज्ञानकी स्थितिसे विचलित नहीं किया जा सकता। इसीको स्पष्ट करते हैं कि कार्यकरण और विषयोंके आकारमें परिणत हुए गुण ही एकमें एक बर्त रहे हैं -- जो ऐसा समझकर स्थित रहता है? चलायमान नहीं होता अर्थात् अविचलभावसे स्वरूपमें ही स्थित रहता है। यहाँ छन्दोभङ्ग होनेके भयसे आत्मनेपद ( अवतिष्ठते ) के स्थानमें परस्मैपद ( अवतिष्ठति ) का प्रयोग किया गया है अथवा योऽवतिष्ठति के स्थानमें योऽनुतिष्ठति ऐसा पाठान्तर समझना चाहिये।