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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।14.22।।इस ( उपर्युक्त ) श्लोकमें अर्जुनने गुणातीतके लक्षण और गुणातीत होनेका उपाय पूछा है? उन दोनों प्रश्नोंका उत्तर देनेके लिये श्रीभगवान् बोले कि पहले गुणातीत पुरुष किनकिन लक्षणोंसे युक्त होता है उसे सुन --, सत्त्वगुणका कार्य प्रकाश? रजोगुणका कार्य प्रवृत्ति और तमोगुणका कार्य मोह? ये जब प्राप्त होते हैं अर्थात् भली प्रकार विषयभावसे उपलब्ध होते है? तब वह इनसे द्वेष नहीं किया करता। अभिप्राय यह कि मुझमें तामसभाव उत्पन्न हो गया? उससे मैं मोहित हो गया और दुःखरूप राजसी प्रवृत्ति मुझमें उत्पन्न हुई? उस राजसभावने मुझे प्रवृत्त कर दिया? इसने मुझे स्वरूपसे विचलित कर दिया? यह जो अपनी स्वरूपस्थितिसे विचलित होना है? वह मेरे लिये बड़ा भारी दुःख है तथा प्रकाशमय सात्त्विक गुण? मुझे विवेकित्व प्रदान करके और सुखमें नियुक्त करके बाँधता है? इस प्रकार साधारण मनुष्य अयथार्थदर्शी होनेके कारण उन गुणोंसे द्वेष किया करते हैं? परंतु गुणातीत पुरुष उनकी प्राप्ति होनेपर उनसे द्वेष नहीं करता। तथा जैसे सात्त्विक? राजस और तामस पुरुष? जब सात्त्विक आदि भाव अपना स्वरूप प्रत्यक्ष कराकर निवृत्त हो जाते हैं? तब ( पुनः ) उनको चाहते हैं। वैसे गुणातीत उन निवृत्त हुए गुणोंके कार्योंको नहीं चाहता यह अभिप्राय है।
( परंतु ये
2()৷৷)
2सब लक्षण दूसरोंको प्रत्यक्ष होनेवाले नहीं हैं। तो कैसे हैं अपने आपको ही प्रत्यक्ष होनेके कारण ये स्वसंवेद्य ही हैं क्योंकि अपने आपमें होनेवाले द्वेष या आकाङ्क्षाको दूसरा नहीं देख सकता।