Sbg 13.5 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।13.5।।श्रोताकी बुद्धिमें रुचि उत्पन्न करनेके लिये? उस कहे जानेवाले क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके यथार्थ स्वरूपकी स्तुति करते हैं --, ( यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व ) वसिष्ठादि ऋषियोंद्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और ऋग्वेदादि नाना प्रकारके श्रुतिवाक्योंद्वारा भी पृथक्पृथक् -- विवेचनपूर्वक कहा गया है। तथा संशयरहित निश्चित ज्ञान उत्पन्न करनेवाले विनिश्चित और युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्रके पदोंसे भी कहा गया है। जो वाक्य ब्रह्मके सूचक हैं उसका नाम ब्रह्मसूत्र है? उनके द्वारा ब्रह्म पाया जाता है -- जाना जाता है? इसलिये उनको पद कहते हैं? उनसे भी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व कहा गया है क्योंकि केवल आत्मा ही सब कुछ है ऐसी उपासना करनी चाहिये इत्यादि ब्रह्मसूचक पदोंसे ही आत्मा जाना जाता है।