Sbg 13.32 htshg

From IKS BHU
Jump to navigation Jump to search

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।13.32।।एक ही आत्मा सब शरीरोंका आत्मा माना जानेसे? उसका उन सबके दोषोंसे सम्बन्ध होगा? ऐसी शंका होनेपर यह कहा जाता है --, आदि कारणको कहते हैं? जिसका कोई कारण न हो? उसका नाम अनादि है और अनादिके भावका नाम अनादित्व है यह परमात्मा अनादि होनेके कारण अव्यय है क्योंकि जो वस्तु आदिमान् होती है? वही अपने,स्वरूपसे क्षीण होती है। किंतु यह परमात्मा अनादि है? इसलिये अवयवरहित है। अतः इसका क्षय नहीं होता। तथा निर्गुण होनेके कारण भी यह अव्यय है क्योंकि जो वस्तु गुणयुक्त होती है? उसका गुणोंके क्षयसे क्षय होता है। परंतु यह ( आत्मा ) गुणरहित है? अतः इसका क्षय नहीं होता। सुतरां यह परमात्मा अव्यय है? अर्थात् इसका व्यय नहीं होता। ऐसा होनेके कारण यह आत्मा शरीरमें स्थित हुआ भीशरीरमें रहता हुआ भी कुछ नहीं करता है? तथा कुछ न करनेके कारण ही उसके फलसे भी लिप्त नहीं होता है। आत्माकी शरीरमें प्रतीति होती है? इसलिये शरीरमें स्थित कहा जाता है। क्योंकि जो कर्ता होता है वही कर्मोंके फलसे लिप्त होता है। परंतु यह अकर्ता है? इसलिये फलसे लिप्त नहीं होता? यह अभिप्राय है। पू 0 -- तो फिर शरीरोंमें ऐसा कौन है जो कर्म करता है और उसके फलसे लिप्त होता है यदि यह मान लिया जाय कि? परमात्मासे भिन्न कोई शरीरी कर्म करता है और उसके फलसे लिप्त होता है तब तो क्षेत्रज्ञ भी तू मुझे ही जान इस प्रकार जो क्षेत्रज्ञ और ईश्वरकी एकता कही है? वह अयुक्त ठहरेगी। यदि यह माना जाय कि ईश्वरसे पृथक् अन्य कोई शरीरी नहीं है तो यह बतलाना चाहिये फिर कौन करता और लिप्त होता है अथवा यह कह देना चाहिये कि ( इन सबसे ) पर कोई ईश्वर ही नहीं है। ( बात तो यह है कि ) भगवान्द्वारा कहा हुआ यह उपनिषद्रूप दर्शन सर्वथा दुर्विज्ञेय और दुर्वाच्य है? इसीलिये वैशेषिक? सांख्य? जैन और बौद्धमतावलम्बियोंद्वारा यह छोड़ दिया गया है। उ 0 -- इसका उत्तर स्वभाव ही बर्तता है ऐसा कहकर भगवान्ने स्वयं ही दे दिया है क्योंकि अविद्यामात्र स्वभाववाला ही करता है? और लिप्त होता है? इसीसे यह व्यवहार चल रहा है। वास्तवमें अद्वितीय परमात्मामें वे ( कर्तापन और लिप्त होना आदि ) नहीं हैं। सुतरां इस वास्तविक ज्ञानदर्शनमें स्थित हुए ज्ञाननिष्ठ? परमहंस परिव्राजक संन्यासियोंका जिन्होंने अविद्याकृत समस्त व्यवहारका तिरस्कार कर दिया है? कर्मोंमें अधिकार नहीं है -- यह बात जगहजगह भगवान्द्वारा दिखलायी गयी है।