Sbg 13.31 htshg
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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।13.31।।फिर भी? उसी यथार्थ ज्ञानकी दूसरे शब्दोंसे व्याख्या करते हैं --, जिस समय ( यह विद्वान् ) भूतोंके अलगअलग भावोंको -- भूतोंकी पृथक्ताको? एक आत्मामें ही स्थित देखता है अर्थात् शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे मनन करके आत्माको इस प्रकार प्रत्यक्षभावसे देखता है कि यह सब कुछ आत्मा ही है। तथा उस आत्मासे ही सारा विस्तार -- सबकी उत्पत्ति -- विकास देखता है अर्थात् जिस समय आत्मासे ही प्राण? आत्मासे ही आशा? आत्मासे ही संकल्प? आत्मासे ही आकाश? आत्मासे ही तेज? आत्मासे ही जल? आत्मासे ही अन्न? आत्मासे ही सबका प्रकट और लीन होना इत्यादि प्रकारसे सारा विस्तार आत्मासे ही हुआ देखने लगता है उस समय वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है -- ब्रह्मरूप ही हो जाता है।