Sbg 13.28 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।13.28।। न स भूयोऽभिजायते इस कथनसे पूर्णज्ञानका फल? अविद्या आदि संसारके बीजोंकी निवृत्तिद्वारा पुनर्जन्मका अभाव बतलाया गया? तथा अविद्याजनित क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगको जन्मका कारण बतलाया गया। इसलिये उस अविद्याको निवृत्ति करनेवाला पूर्ण ज्ञान? यद्यपि पहले कहा जा चुका है तो भी दूसरे शब्दोंमें फिर कहा जाता है --, ( जो पुरुष ) ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त प्राणियोंमें समभावसे स्थित -- ( व्याप्त ) हुए परमेश्वरको अर्थात् शरीर? इन्द्रिय? मन? बुद्धि अव्यक्त और आत्माकी अपेक्षा जो परम ईश्वर है? उस परमेश्वरको सब भूतोंमें समभावसे स्थित देखता है। यहाँ भूतोंसे परमेश्वरकी अत्यन्त विलक्षणता दिखलानेके निमित्त भूतोंके लिये विनाशशील और परमेश्वरके लिये अविनाशी विशेषण देते हैं। पू 0 -- इससे परमेश्वरकी विलक्षणता कैसे सिद्ध होती है उ 0 -- सभी भावविकारोंका जन्मरूप? भावविकार मूल है। अन्य सब भावविकार जन्मके पीछे होनेवाले और विनाशमें समाप्त होनेवाले हैं। भावका अभाव हो जानेके कारण विनाशके पश्चात् कोई भी भावविकार नहीं रहता क्योंकि धर्मीके रहते ही धर्म रहते हैं। इसलिये अन्तिम भावविकारके अभावका ( अविनश्यन्तम् इस पदके द्वारा ) अनुवाद करनेसे पहले होनेवाले? सभी भावविकारोंका कार्यके सहित प्रतिषेध हो जाता है। सुतरां ( उपर्युक्त वर्णनसे ) परमेश्वरकी सब भूतोंसे अत्यन्त ही विलक्षणता तथा निर्विशेषता और एकता भी सिद्ध होती है। अतः जो इस प्रकार उपर्युक्त भावसे परमेश्वरको देखता है वही देखता है। पू 0 -- सभी लोग देखते हैं फिर वही देखता है इस विशेषणसे क्या प्रयोजन है उ 0 -- ठीक है? ( अन्य सब भी ) देखते हैं परंतु विपरीत देखते हैं? इसलिये वह विशेषण दिया गया है कि वही देखता है। जैसे कोई तिमिररोगसे दूषित हुई दृष्टिवाला अनेक चन्द्रमाओंको देखता है? उसकी अपेक्षा एक चन्द्र देखनेवालेकी यह विशेषता बतलायी जाती है कि वही ठीक देखता है। वैसे ही यहाँ भी जो आत्माको उपर्युक्त प्रकारसे विभागरहित एक देखता है? उसकी अलगअलग अनेक आत्मा देखनेवाले विपरीतदर्शियोंकी अपेक्षा यह विशेषता बतलायी जाती है कि वही ठीकठीक देखता है। अभिप्राय यह है कि दूसरे सब अनेक चन्द्र देखनेवालेकी भाँति विपरीत भावसे देखनेवाले होनेके कारण? देखते हुए भी वास्तवमें नहीं देखते।