Sbg 13.25 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।13.25।।यहाँ आत्मदर्शनके विषयमें ये ध्यान आदि भिन्नभिन्न साधन विकल्पसे कहे जाते हैं --, शब्दादि विषयोंसे श्रोत्रादि इन्द्रियोंको हटाकर उनका मनमें निरोध करके और मनको अन्तरात्मामें ( निरोध करके ) जो एकाग्रभावसे चिन्तन करते रहना है? उसका नाम ध्यान है। तथा जैसे बगुला ध्यान करता है जैसे पृथिवी ध्यान करती है जैसे पर्वत ध्यान करते हैं इत्यादि उपमा दी जानेके कारण तैलधाराकी भाँति निरन्तर अविच्छिन्नभावसे चिन्तन करनेका नाम ध्यान है? उस ध्यानद्वारा कितने ही योगीलोग आत्मामें -- बुद्धिमें? आत्माको यानी प्रत्यक्चेतनको आत्मासे -- ध्यानाभ्यासद्वारा शुद्ध हुए अन्तःकरणसे -- देखते हैं। अन्य कई योगीजन सांख्ययोगके द्वारा ( देखते हैं ) -- सत्त्व? रज और तम -- ये तीनों गुण मुझसे देखे जानेवाले हैं और मैं उनसे भिन्न उनके व्यापारका साक्षी? उन गुणोंसे विलक्षण और नित्य ( चेतन ) आत्मा हूँ इस प्रकारके चिन्तनका नाम सांख्य है? यही योग है? ऐसे सांख्ययोगके द्वारा -- आत्मामें आत्माको देखते हैं। तथा अपर योगीजन कर्मयोगके द्वारा -- ईश्वरार्पणबुद्धिसे अनुष्ठान की हुई चेष्टाका नाम कर्म है? वही योगका साधन होनेके कारण गौणरूपसे योग कहा जाता है? उस कर्मयोगके द्वारा -- अन्तःकरणकी शुद्धि और,ज्ञानप्राप्तिके क्रमसे? ( आत्मामें आत्माको देखते हैं )।