Sbg 13.19 htshg

From IKS BHU
Jump to navigation Jump to search

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।13.19।।उपर्युक्त समस्त अर्थका उपसंहार करनेके लिये यह श्लोक आरम्भ किया जाता है --, इस प्रकार यह महाभूतोंसे लेकर धृतिपर्यन्त क्षेत्रका स्वरूप?अमानित्व आदिसे लेकर तत्त्वज्ञानार्थदर्शन पर्यन्त ज्ञानका स्वरूप और ज्ञेयं यत्तत् यहाँ लेकर तमसः परमुच्यते यहाँतक ज्ञेयका स्वरूप? संक्षेपसे कह दिया गया। यह सब वेदोंका और गीताका अर्थ इकट्ठा करके कहा गया है। इस यथार्थ ज्ञानका अधिकारी कौन है? सो कहा जाता है -- मेरा भक्त अर्थात् मुझ सर्वज्ञ? परमगुरु? वासुदेव परमेश्वरमें अपने सारे भावोंको जिसने अर्पण कर दिया है। जिस किसी भी वस्तुको देखता? सुनता और स्पर्श करता है? उस सबमें सब कुछ भगवान् वासुदेव ही है ऐसी निश्चित बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है। वह उपर्युक्त यथार्थ ज्ञानको समझकर मेरे भावको अर्थात् मेरा जो परमात्मभाव है? उसको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है? अर्थात् मोक्ष लाभ कर लेता है।