Sbg 13.18 htshg

From IKS BHU
Jump to navigation Jump to search

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।13.18।।यदि सर्वत्र विद्यमान होते हुए भी ज्ञेय प्रत्यक्ष नहीं होता? तो क्या वह अन्धकार है नहीं। तो क्या है --, वह ज्ञेय ( परमात्मा ) समस्त सूर्यादि ज्योतियोंका भी परम ज्योति है क्योंकि आत्मचैतन्यके प्रकाशसे देदीप्यमान होकर ही ये सूर्य आदि समस्त ज्योतियाँ प्रकाशित हो रही हैं। जिस तेजसे प्रदीप्त होकर सूर्य तपता है उसीके प्रकाशसे यह सब कुछ प्रकाशित है इत्यादि,श्रुतिप्रमाणोंसे और यहीं कहे हुए यदादित्यगतं तेजः इत्यादि स्मृतिवाक्योंसे भी उपर्युक्त बात ही सिद्ध होती है। तथा वह ज्ञेय अन्धकारसे -- अज्ञानसे परे अर्थात् अस्पृष्ट बतलाया जाता है। ज्ञान आदिका सम्पादन करना बहुत दुर्घट है -- ऐसी बुद्धिसे उत्साहरहित -- खिन्नचित्त हुए साधकको उत्साहित करनेके लिये कहते हैं -- ज्ञान अर्थात् अमानित्व आदि ज्ञानके साधन? ज्ञेय अर्थात् ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि इत्यादि वाक्योंसे बतलाया हुआ परमात्माका स्वरूप और ज्ञानगम्य -- ज्ञेय ही जान लिया जानेपर ज्ञानका फल होनेके कारण ( पहले ) ज्ञानगम्य कहा जाता है और जब जान लिया जाता है उस अवस्थामें ज्ञेय कहलाता है। ये तीनों ही समस्त प्राणिमात्रके अन्तःकरणमें विशेषरूपसे स्थित हैं क्योंकि ये तीनों वहीं प्रकाशित होते हैं।