Sbg 13.12 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।13.12।।तथा --, अध्यात्मज्ञाननित्यत्व आत्मादिविषयक ज्ञानका नाम अध्यात्मज्ञान है? उसमें नित्यस्थिति। तत्त्वज्ञानके अर्थकी आलोचना अर्थात् अमानित्वादि ज्ञानसाधनोंकी परिपक्व भावनासे उत्पन्न होनेवाला जो तत्त्वज्ञान है उसका अर्थ जो संसारकी उपरतिरूप मोक्ष है? उसकी आलोचना। क्योंकि तत्त्वज्ञानके फलकी आलोचना करनेसे ही उसके साधनोंमें प्रवृत्ति होगी। अमानित्व से लेकर तत्त्वज्ञानके अर्थकी आलोचनापर्यन्त कहा हुआ समस्त साधनसमुदाय ज्ञानका साधन होनेके कारण ज्ञान इस नामसे कहा गया है। इससे अर्थात् उपर्युक्त ज्ञानसाधनोंके समुदायसे विपरीत जो मानित्व? दम्भित्व? हिंसा? क्षमाका अभाव? कुटिलता इत्यादि अवगुणसमुदाय है वह संसारमें प्रवृत्त करनेका हेतु होनेसे उसे त्याग करनेके लिये अज्ञान समझना चाहिये। उपर्युक्त ज्ञानद्वारा जाननेयोग्य क्या है इस आकाङ्क्षापर ज्ञेयं यत्तत् इत्यादि श्लोक कहते हैं -- पू 0 -- अमानित्व आदि गुण तो यम और नियम हैं? उनसे ज्ञेय वस्तु नहीं जानी जा सकती क्योंकि अमानित्वादि सद्गुण किसी वस्तुके ज्ञापक नहीं देखे गये हैं। सभी जगह यह देखा जाता है कि जो ज्ञान जिस वस्तुको विषय करनेवाला होता है वही उसका ज्ञापक होता है? अन्य वस्तुविषयक ज्ञानसे अन्य वस्तु नहीं जानी जाती। जैसे घटविषयक ज्ञानसे अग्नि नहीं जाना जाता।