Sbg 12.19 htshg
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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।12.19।। तथा --, जिसके लिये निन्दा और स्तुति दोनों बराबर हो गयी हैं? जो मुनि संयतवाक् है अर्थात् वाणी जिसके वशमें है तथा जो जिस किसी प्रकारसे भी शरीरस्थितिमात्रसे सन्तुष्ट है। कहा भी है कि जो जिस किसी ( अन्य ) मनुष्यद्वारा ही वस्त्रादिसे ढका जाता है? एवं जिस किसी ( दूसरे ) के द्वारा ही जिसको भोजन कराया जाता है और जो जहाँ कहीं भी सोनेवाला होता है उसको देवता लोग ब्राह्मण समझते हैं। तथा जो स्थानसे रहित है अर्थात् जिसका कोई नियत निवासस्थान नहीं है? अन्य स्मृतियोंमें भी अनागारः इत्यादि वचनोंसे यही कहा है? तथा जो स्थिरबुद्धि है -- जिसकी परमार्थविषयक बुद्धि स्थिर हो चुकी है? ऐसा भक्तिमान् पुरुष मेरा प्यारा है।