Sbg 12.14 scsri

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Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami ।।12.14।। संतुष्ट इति। सततं लाभेऽलाभे च संतुष्टः प्रसन्नचित्तो योग्यप्रमत्तो यतात्मा संयतस्वभावः दृढो मद्विषयो निश्चयो यस्य मय्यर्पिते मनोबुद्धी येन एवंभूतो यो मद्भक्तः स मे प्रियः।