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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।12.14।।तथा जो सदा ही सन्तुष्ट है अर्थात् देह स्थितिके कारणरूप पदार्थोंकी लाभ हानिमें जिसके जो कुछ होता है वही ठीक है ऐसा अलम् भाव हो गया है? इस प्रकार जो गुणयुक्त वस्तुके लाभमें और उसकी हानिमें सदा ही सन्तुष्ट रहता है। तथा जो समाहितचित्त? जीते हुए स्वभाववाला और दृढ़ निश्चयवाला है अर्थात् आत्मतत्त्वके विषयमें जिसका निश्चय स्थिर हो चुका है। तथा जो मुझमें अर्पण किये हुए मनबुद्धिवाला है अर्थात् जिस संन्यासीका संकल्प विकल्पात्मक मन और निश्चयात्मिका बुद्धि ये दोनों मुझमें समर्पित हैं -- स्थापित हैं। जो ऐसा मेरा भक्त है वह मेरा प्यारा है। ज्ञानीको मैं अत्यन्त प्यारा हूँ और वह मुझे प्रिय है इस प्रकार जो सप्तम अध्यायमें सूचित किया गया था उसीका यहाँ विस्तारपूर्वक वर्णन किया जाता है।