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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।12.13।।इसलिये जिन्होंने समस्त इच्छाओंका त्याग कर दिया है? ऐसे अक्षरोपासक यथार्थ ज्ञाननिष्ठ संन्यासियोंका जो साक्षात् मोक्षका कारणरूप अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् इत्यादि धर्मसमूह है उसका वर्णन करूँगा? इस उद्देश्यसे भगवान् कहना आरम्भ करते हैं --, जो सब भूतोंमें द्वेषभावसे रहित है अर्थात् अपने लिये दुःख देनेवाले भी किसी प्राणीसे द्वेष नहीं करता? समस्त भूतोंको आत्मारूपसे ही देखता है। तथा जो मित्रतासे युक्त है अर्थात् सबके साथ मित्रभावसे बर्तता है और करुणामय है -- दीनदुखियोंपर दया करना करुणा है? उससे युक्त है? अभिप्राय यह कि जो सब भूतोंको अभय देनेवाला संन्यासी है। तथा जो ममतासे रहित और अहंकारसे रहित है? एवं सुखदुःखमें सम है अर्थात् सुख और दुःख जिसके अन्तःकरणमें रागद्वेष उत्पन्न नहीं कर सकते। जो क्षमावान् है अर्थात् किसीके द्वारा गाली दी जानेपर या पीटे जानेपर भी जो विकाररहित ही रहता है।