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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।11.48।। मेरे रूपका दर्शन करके तू निःसंदेह कृतार्थ हो गया है। इस प्रकार उस रूपदर्शनकी स्तुति करते हैं --, न तो वेद और यज्ञोंके अध्ययनद्वारा अर्थात् न तो चारों वेदोंका यथावत् अध्ययन करनेसे और न यज्ञोंका अध्ययन करनेसे ही ( मैं दर्शन दे सकता हूँ )। वेदोंके अध्ययनसे ही यज्ञोंका अध्ययन सिद्ध हो सकता था? उसपर भी जो अलग यज्ञोंके अध्ययनका ग्रहण है? वह यज्ञविषयक विशेष विज्ञानके उपलक्षणके लिये है। वैसे ही न मनुष्यके बराबर तोलकर सुवर्णादि दान करनेसे? न श्रौतस्मार्तादि अग्निहोत्ररूप क्रियाओंसे और न चान्द्रायण आदि उग्र तपोंसे ही मैं अपने ऐसे रूपका दर्शन दे सकता हूँ। हे कुरुप्रवीर जैसा विश्वरूप तुझे दिखाया गया है वैसा मैं तेरे सिवा इस मनुष्यलोकमें और किसीके द्वारा नहीं देखा जा सकता।