Sbg 11.45 moolam

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अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा


भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।


तदेव मे दर्शय देव रूपं


प्रसीद देवेश जगन्निवास।।11.45।।