Sbg 11.37 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।11.37।।भगवान् हर्षादि भावोंके योग्य स्थान किस प्रकार हैं इसमें कारण दिखाते हैं --, हे महात्मन् आप जो अतिशय गुरुतर हैं अर्थात् सबसे बड़े हैं? उनको ये सब किसलिये नमस्कार न करें क्योंकि आप हिरण्यगर्भके भी आदिकर्ता -- कारण हैं? अतः आप आदिकर्ताको कैसे नमस्कार न करें। अभिप्राय यह कि उपर्युक्त कारणसे आप हर्षादिके और नमस्कारके योग्य पात्र हैं। हे अनन्त हे देवेश हे जगन्निवास वह परम अक्षर ( ब्रह्म ) आप ही हैं? जो वेदान्तोंमें सुना जाता है। वह क्या है सत् और असत् -- जो विद्यमान है वह सत् और जिसमें नहीं है ऐसी बुद्धि होती है वह असत् है। वे दोनों सत् और असत् जिस अक्षरकी उपाधि हैं? जिनके कारण वह ब्रह्म उपचारसे सत् और असत् कहा जाता है परंतु वास्तवमें जो सत् और असत् दोनोंसे परे है? जिसको वेदवेत्ता लोग अक्षर कहते हैं वह ब्रह्म भी आप ही हैं। अभिप्राय यह कि आपसे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है।


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