Sbg 10.7 htshg
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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।10.7।।मेरी इस उपर्युक्त विभूतिको अर्थात् विस्तारको और योग -- युक्तिको अर्थात् अपनी मायिक घटनाको? अथवा योगसे उत्पन्न हुई सर्वज्ञतारूप सामर्थ्यको जो कि योगशब्दसे कही जाती है? जो तत्त्वसे -- यथार्थ जानता है? वह पुरुष पूर्ण ज्ञानकी स्थिरतारूप निश्चल योगसे युक्त हो जाता है? इस विषयमें ( कुछ भी ) संशय नहीं है।