Sbg 10.4 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।10.4।। इसलिये भी मैं लोकोंका महान् ईश्वर हूँ --, सूक्ष्म? सूक्ष्मतर आदि पदार्थोंको समझनेवाली अन्तःकरणकी ज्ञानशक्तिका नाम बुद्धि है। उससे युक्त मनुष्यको ही बुद्धिमान् कहते हैं। ज्ञान -- आत्मा आदि पदार्थोंका बोध? असंमोह -- जाननेयोग्य पदार्थ प्राप्त होनेपर उनमें विवेकपूर्वक प्रवृत्ति? क्षमा -- किसीके द्वारा अपनी निन्दाकी जाने या ताड़ना दी जानेपर भी चित्तमें विकार न होना? सत्य -- देखने और सुननेसे जिस प्रकारका अपनेको अनुभव हुआ हो? उसको दूसरेकी बुद्धिमें पहुँचानेके लिये उसी प्रकार कही जानेवाली वाणी सत्य कहलाती है? दम -- बाह्य इन्द्रियोंको वशमें कर लेना? शम -- अन्तःकरणकी उपरति? सुख -- आह्लाद? दुःख -- सन्ताप? भव -- उत्पत्ति? अभाव -- उत्पत्तिके विपरीत ( विनाश ) तथा भय -- त्रास और अभय -- उसके विपरीत जो निर्भयता है वह भी।