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सूत्र
तथाऽत्यन्तसंशयस्तद्धर्मसातत्योपपत्तेः 2/1/5
पदच्छेद
तथा, अत्यन्तसंशयः, तद्धर्मसातत्योपपत्तेः।
पदपदार्थ
| संख्या | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | तथा | इसी प्रकार |
| 2 | अत्यन्तसंशयः | सदा संशय होने लगेगा |
| 3 | तद्धर्मसातत्योपपत्तेः | क्योंकि संशय के कारण समान धर्म आदि निरन्तर हो सकते हैं |
सूत्रकार
जो सिद्धान्ती ने पांचो प्रकार के संशय के कारण माने हैं उन समानधर्म, विशेषधर्म आदिकों के निरन्तर वर्तमान होने के कारण सदा संशय होने की आपत्ति आ जायगी, इस कारण भी सिद्धान्ती के कहे पाँचो प्रकार के संशय नहीं हो सकते ।
भाष्यकार
( पंचम सूत्र की व्याख्या करते हुए भाष्यकार कहते हैं कि जिस प्रकार से आप (सिद्धान्ती) समानधर्म के होने से संशय होता है ऐसा मानते हैं, उस प्रकार से तो अत्यन्त (सदा) संशय होने को आपत्ति आ सकती है, क्योंकि उस समानधर्म के होने का उच्छेद (नाश) न होने से संशय का भी उच्छेद (नाश) न हो सकेगा, क्योंकि ऊंचा पदार्थरूप धर्मी बिना ऊंचाई रूप समानधर्म के संशय नहीं कराता, किन्तु निरन्तर (सदा) ऊंचाई रूप समानधर्मवाला होता ही है।' (अर्थात् यह वृक्ष है अथवा मनुष्य ऐसे संदेह के पश्चात् यह वृक्ष ही है ऐसा निश्चित ज्ञान होने पर भी ऊंचाई रूप समानधर्म का ज्ञान वर्तमान ही है। उक्त निश्चित ज्ञान से वे ऊंचाई आदि धर्म तथा उनका ज्ञान तो जाता नहीं, अतः यदि समान (ऊंचाई) आदि धर्मों का ज्ञान ही संशय का कारण हो तो उक्त 'यह वृक्ष ही है' ऐसे निश्चितज्ञान के पश्चात् भी संशय होने लगेगा, ऐसा सूत्र में पूर्वपक्षी का आशय है ।