2/1/14

From IKS BHU
Jump to navigation Jump to search

सूत्र

तत्प्रामाण्ये वा न सर्वप्रमाणविप्रतिषेधः 2/1/14


पदच्छेद

तत्प्रामाण्ये वा, न, सर्वप्रमाणविप्रतिषेधः।


पदपदार्थ

संख्या पद अर्थ
1 तत्प्रामाण्ये वा अथवा अपने प्रतिज्ञादि अवयवसमूहरूप वाक्य को पूर्वपक्षी प्रमाण माने
2 नहीं होगा
3 सर्वप्रमाणप्रतिषेधः सम्पूर्ण प्रमाणों का निषेध सिद्ध न होगा

सूत्रकार

प्रत्यक्षादिक प्रमाण नहीं है इस प्रतिज्ञा को सिद्ध करने वाला पूर्वपक्षी यदि प्रतिज्ञादि पांच अवयवों में वर्तमान प्रत्यक्षादिकों को प्रमाण माने तो सिद्धान्ती के वाक्य के भी प्रतिज्ञादि पांच अवयवों में वर्तमान प्रत्यक्षादि समानता होने के कारण प्रमाण मानना पड़ेगा । ऐसा होने से सम्पूर्ण प्रमाणमात्र का निषेध सिद्ध न होगा। अतः पूर्वपक्षी का प्रमाण सामान्य का खण्डन करना अयुक्त है ।


भाष्यकार

(१४ चतुर्दशसूत्र की भाष्यकार व्याख्या करते हैं कि)- 'प्रत्यक्षादि प्रमाण नहीं है इस निषेधरूप अपने वाक्य समूह में उनके अवयवों को आश्रित करने वाले (उनमें रहने वाले) प्रत्यक्षादिकों को यदि पूर्वपक्षी माने तो पर (दूसरे सिद्धान्ती) के भी प्रतिज्ञा पांच अवयवों में वर्तमान भी प्रत्यक्षादिकों को प्रमाण मानना होगा, क्योंकि दोनों में कोई विशेषता नहीं है। और ऐसा होने से सम्पूर्ण प्रमाणों का निषेध न हो सकेगा। यहां सूत्र में 'विप्रतिषेधः' इस पद में 'वि' यह उपसर्ग सम्पूर्ण प्रमाणों के निषेध का यथार्थ ज्ञान होना इस अर्थ का बोधक है न कि व्याघात (विशेष) रूप अर्थ का बोधक है, क्योंकि उससे कोई प्रयोजन नहीं निकलता (अर्थात्) विशेष रूप से सम्पूर्ण प्रमाणों का 'निषेध' यह कहना ही विप्रतिषेध शब्द का अर्थ है। कुछ प्रमाणों को पूर्वपक्षी मानता है, और कुछ प्रमाणों का निषेध करता है यह उचित नहीं है (अर्थात्) प्रमाण का निषेध करने वाले माध्यमिक पूर्वपक्षी को यह उचित नहीं हैं।


भाषान्तर

If you say that your denial is based on a certain means of right knowledge, you do thereby acknowledge the validity of the means