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स द्विविधो दृष्टादृष्टार्थत्वात् 1/1/8


संधि विच्छेद:

स = स

द्विविधः = द्वि + विधः

दृष्टादृष्टार्थत्वात् = दृष्ट + अदृष्ट + अर्थत्वात्


अर्थ:

  1. : "वह" (यहाँ संदर्भ है शब्द प्रमाण का)।
  2. द्विविधः: दो प्रकार का।
    • द्वि: दो।
    • विधः: प्रकार।
  3. दृष्टादृष्टार्थत्वात्: दृष्ट और अदृष्ट अर्थों के कारण।
    • दृष्ट: जो प्रत्यक्ष रूप से देखा गया हो।
    • अदृष्ट: जो अप्रत्यक्ष या अदृश्य हो।
    • अर्थत्वात्: अर्थ के कारण।

व्याख्या:

यह न्याय दर्शन में शब्द प्रमाण के दो प्रकारों की व्याख्या करता है। शब्द प्रमाण को उसके उद्देश्य (अर्थ) के आधार पर दो भागों में विभाजित किया गया है:

  1. दृष्टार्थ (प्रत्यक्ष उद्देश्य): इसका तात्पर्य उन विषयों से है, जो प्रत्यक्ष रूप से समझे या अनुभव किए जा सकते हैं।
    • उदाहरण: "यह पर्वत ऊँचा है।" (यह प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है।)
  2. अदृष्टार्थ (अप्रत्यक्ष उद्देश्य): इसका तात्पर्य उन विषयों से है, जो अप्रत्यक्ष हैं और जिन्हें केवल शब्द प्रमाण के माध्यम से समझा जा सकता है।
    • उदाहरण: "स्वर्ग में यज्ञ करने से पुण्य प्राप्त होता है।" (यह प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं जाना जा सकता, केवल वेदों या शास्त्रों के माध्यम से ज्ञेय है।)

निष्कर्ष:

"स द्विविधो दृष्टादृष्टार्थत्वात्" का अर्थ है कि शब्द प्रमाण दो प्रकार का होता है:

  1. दृष्टार्थ: प्रत्यक्ष रूप से समझने योग्य।
  2. अदृष्टार्थ: अप्रत्यक्ष, जिसे केवल प्रामाणिक शब्दों (जैसे वेद या गुरु के कथन) के माध्यम से जाना जा सकता है।

यह विभाजन ज्ञान के स्रोत को स्पष्ट करता है और यह दिखाता है कि शब्द प्रमाण प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के ज्ञान को उपलब्ध कराता है।