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हेत्वपदेशात्प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम् 1/1/39


संधि विच्छेद:

  • हेतु + अपदेशात् + प्रतिज्ञायाः + पुनर्वचनं + निगमनम्।

पदच्छेद और अर्थ:

  1. हेतु:
    • अर्थ: कारण, तर्क।
    • संदर्भ: किसी चीज़ या घटना के होने का कारण।
  2. अपदेशात्:
    • अपदेश (निषेध या अव्याख्यान) + आत् (पंचमी विभक्ति) = अव्याख्यान के कारण।
    • अर्थ: किसी कारण के बिना, बिना स्पष्ट व्याख्या के।
  3. प्रतिज्ञायाः:
    • अर्थ: प्रतिज्ञा, घोषित किया गया वचन।
    • संदर्भ: कोई सिद्धांत या कथन जो सिद्ध किया जा रहा है।
  4. पुनर्वचनं:
    • पुनर् (फिर, पुनः) + वचनं (कथन, वचन) = फिर से कथन, पुनः वचन।
    • अर्थ: किसी कथन या प्रतिज्ञा का पुनरावृत्ति, पुनः कथन।
  5. निगमनम्:
    • अर्थ: निष्कर्ष, संपूर्ण तर्क का उपसंहार।
    • संदर्भ: किसी तर्क के आधार पर अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचना।

पूरा अर्थ:

"हेत्वपदेशात्प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम्" का अर्थ है:

"तर्क के निषेध (अव्याख्यान) के कारण प्रतिज्ञा का पुनः कथन और तर्क का निष्कर्ष।"


व्याख्या:

यह वाक्यांश न्याय शास्त्र में किसी तर्क के अंतिम निष्कर्ष और प्रतिज्ञा के पुनरावलोकन से संबंधित है।

  • हेतु का अर्थ है वह कारण जो किसी बात या घटना को स्पष्ट करता है।
  • अपदेशात् यह संकेत करता है कि जब कोई तर्क या प्रमाण स्पष्ट नहीं हो या वह निषेध का सामना करता है, तो पुनः वही प्रतिज्ञा (घोषित वचन) कही जाती है।
  • पुनर्वचनं का अर्थ है कि कोई निष्कर्ष, जो पहले कहा गया था, उसे पुनः व्यक्त किया जाता है।
  • अंत में, निगमनम् वह निष्कर्ष है, जो इस तर्क और प्रतिज्ञा के आधार पर निकाला जाता है।

उदाहरण सहित विवरण:

तर्क:

"पर्वतो वह्निमान् धूमवत्त्वात्।"

(पहाड़ में आग है क्योंकि वहाँ धुआँ है।)

  1. हेतु:
    • धुआँ होना आग का कारण है।
  2. अपदेश:
    • यदि कोई तर्क अपने निषेध के बिना है, तो उसकी पुष्टि को और सटीक किया जाता है।
  3. प्रतिज्ञा:
    • यहाँ, प्रतिज्ञा यह है कि "पर्वतो वह्निमान्"।
  4. पुनर्वचनं:
    • प्रतिज्ञा का पुनरावलोकन किया जाता है और कहा जाता है कि "धूमवत्त्वात् पर्वतो वह्निमान्" (धुआँ होने से पहाड़ में आग होती है)।
  5. निगमनम्:
    • निष्कर्ष: तर्क के अनुसार पहाड़ में आग है।

महत्व:

  1. हेतु का स्पष्ट रूप से वर्णन करना किसी तर्क के पुख्ता होने के लिए आवश्यक है।
  2. पुनर्वचन का उद्देश्य किसी तर्क को मजबूत बनाना और उसे स्पष्ट करना है।
  3. निगमनम् तर्क का अंतिम परिणाम है, जो सिद्धांत या प्रतिज्ञा से निकलकर पूर्ण रूप से स्थापित होता है।

सारांश:

"हेत्वपदेशात्प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम्" का अर्थ है:

"तर्क के निषेध के कारण प्रतिज्ञा का पुनरावृत्त कथन और तर्क का निष्कर्ष।"

यह न्याय तर्क में किसी प्रतिज्ञा के पुनः कथन और तर्क के निष्कर्ष को स्पष्ट करता है।