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उदाहरणापेक्षस्तथेत्युपसंहारो न तथेति वा साध्यस्योपनयः 1/1/38
संधि विच्छेद:
- उदाहरण + आपेक्षः + तथा + इति + उपसंहारः + न + तथा + इति + वा + साध्यस्य + उपनयः।
पदच्छेद और अर्थ:
- उदाहरण:
- अर्थ: दृष्टांत, प्रमाण स्वरूप दिया गया उदाहरण।
- संदर्भ: साध्य और हेतु के संबंध को स्पष्ट करने के लिए।
- आपेक्षः:
- अर्थ: अपेक्षा, आवश्यकता।
- संदर्भ: तर्क को प्रमाणित करने के लिए दृष्टांत की आवश्यकता।
- तथा:
- अर्थ: इस प्रकार, ऐसा।
- संदर्भ: दृष्टांत के समान होने की स्थिति।
- इति:
- अर्थ: यह कहा गया।
- संदर्भ: कथन को सीमांकित करने के लिए।
- उपसंहारः:
- अर्थ: निष्कर्ष, अंतिम निर्णय।
- संदर्भ: तर्क का अंतिम रूप।
- न:
- अर्थ: नहीं।
- संदर्भ: जब दृष्टांत समान नहीं हो।
- तथा:
- अर्थ: समानता की स्थिति।
- संदर्भ: साध्य के गुण की दृष्टांत में समानता।
- इति:
- अर्थ: इस प्रकार।
- वा:
- अर्थ: या।
- संदर्भ: वैकल्पिक स्थिति का संकेत।
- साध्यस्य:
- अर्थ: जिसे सिद्ध करना हो।
- संदर्भ: तर्क का लक्ष्य।
- उपनयः:
- अर्थ: उदाहरण का साध्य से संबंध स्थापित करना।
- संदर्भ: तर्क की वह प्रक्रिया जिसमें दृष्टांत और साध्य का संबंध स्पष्ट किया जाता है।
पूरा अर्थ:
"उदाहरणापेक्षस्तथेत्युपसंहारो न तथेति वा साध्यस्योपनयः" का अर्थ है:
"दृष्टांत के आधार पर (उदाहरणापेक्ष) यह दिखाना कि (तथा) साध्य का गुण (उपसंहार) दृष्टांत में भी पाया जाता है, या यदि नहीं पाया जाता (न तथेति), तो उसका उपयुक्त तर्क के माध्यम से खंडन।"
व्याख्या:
इस वाक्यांश में तर्क की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण भाग उपनय का वर्णन किया गया है।
- उपनय का कार्य दृष्टांत और साध्य के बीच संबंध स्थापित करना है।
- इसे दो स्थितियों में किया जा सकता है:
- समानता (तथा इति): जब दृष्टांत में साध्य के गुण पाए जाएँ।
- विपरीतता (न तथेति): जब दृष्टांत में साध्य के गुण न पाए जाएँ।
उदाहरण सहित विवरण:
तर्क:
"पर्वतो वह्निमान् धूमवत्त्वात्।"
(पहाड़ में आग है क्योंकि वहाँ धुआँ है।)
- दृष्टांत: "यथा महात्मनो धूमवन्तः वह्निमन्तः।" (जैसे चूल्हे में धुआँ होता है और वहाँ आग होती है।)
- तथा इति:
- दृष्टांत में आग और धुएँ का संबंध मिलता है।
- यह तर्क को पुष्ट करता है।
- न तथेति:
- यदि दृष्टांत में धुआँ और आग का संबंध न हो (जैसे किसी गीले स्थान में धुआँ तो है लेकिन आग नहीं), तो तर्क का खंडन होता है।
महत्व:
- उपनय तर्क प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण है, जिसमें दृष्टांत और साध्य का संबंध प्रमाणित या खंडित होता है।
- यह स्पष्ट करता है कि तर्क में दृष्टांत केवल समानता (साधर्म्य) पर आधारित नहीं हो सकता, बल्कि इसका विरोध (वैधर्म्य) भी समझा जाना चाहिए।
- यह न्याय दर्शन की तर्क प्रक्रिया को संतुलित और तर्कसंगत बनाता है।
सारांश:
"उदाहरणापेक्षस्तथेत्युपसंहारो न तथेति वा साध्यस्योपनयः" का अर्थ है:
"उदाहरण के आधार पर यह दिखाना कि साध्य का गुण दृष्टांत में है (तथा) या नहीं है (न तथा), और इसे उपनय (तर्क प्रक्रिया) द्वारा प्रमाणित करना।"
यह तर्कशास्त्र की एक संगठित विधि को दर्शाता है।