1/1/24

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यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत् प्रयोजनम् 1/1/24


संधि विच्छेद:

  1. यम् + अर्थम् + अधिकृत्य + प्रवर्तते + तत् + प्रयोजनम्
    • यम्: जिसे, जो।
    • अर्थम्: उद्देश्य, कारण।
    • अधिकृत्य: ध्यान में रखकर, संबंधित होकर।
    • प्रवर्तते: प्रवृत्त होता है, आरंभ करता है।
    • तत्: वह।
    • प्रयोजनम्: उद्देश्य, लाभ।

अर्थ:

यह श्लोक कहता है:

जिस उद्देश्य (अर्थम्) के लिए कोई कार्य आरंभ (प्रवर्तते) होता है, वही उसका प्रयोजन (लक्ष्य) है।

अर्थात, किसी कार्य का आरंभ जिस उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया जाता है, वही उस कार्य का प्रयोजन या मुख्य कारण होता है।


व्याख्या:

  1. कार्य-प्रयोजन संबंध:
    • हर कार्य का कोई न कोई उद्देश्य होता है।
    • व्यक्ति तभी किसी कार्य में प्रवृत्त होता है जब उसके पीछे कोई प्रयोजन या लाभ हो।
  2. दार्शनिक दृष्टि से:
    • न्याय दर्शन में प्रयोजन को ज्ञान और क्रिया के आरंभ का मूल कारण माना गया है।
    • बिना प्रयोजन के कोई कार्य नहीं होता।
  3. व्यावहारिक दृष्टि से:
    • दैनिक जीवन में हर व्यक्ति अपने कार्यों को किसी लक्ष्य या उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए करता है।
    • उदाहरण:
      • भोजन करने का प्रयोजन भूख मिटाना है।
      • अध्ययन का प्रयोजन ज्ञान अर्जित करना या परीक्षा उत्तीर्ण करना है।
  4. न्याय दर्शन में प्रयोजन:
    • न्याय दर्शन में प्रयोजन को हेतु (कारण) और साध्य (उद्देश्य) के रूप में देखा जाता है।
    • यह किसी भी तर्क और प्रमाण की प्रक्रिया में मुख्य भूमिका निभाता है।
    • यदि प्रयोजन स्पष्ट न हो, तो कोई तर्क या क्रिया प्रासंगिक नहीं हो सकती।

उदाहरण:

  1. दार्शनिक संदर्भ:
    • न्याय दर्शन में जब किसी प्रश्न का उत्तर दिया जाता है, तो पहले उस प्रश्न के प्रयोजन को स्पष्ट करना आवश्यक होता है।
  2. व्यावहारिक उदाहरण:
    • यदि कोई व्यापारी व्यापार करता है, तो उसका प्रयोजन लाभ अर्जित करना है।
    • विद्यार्थी का पढ़ाई का प्रयोजन ज्ञान प्राप्त करना है।

निष्कर्ष:

यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत् प्रयोजनम् श्लोक यह स्पष्ट करता है कि किसी भी कार्य या प्रवृत्ति का मूल उद्देश्य या प्रयोजन वही है जिसे ध्यान में रखकर वह कार्य किया गया है। यह विचार हमें अपने कार्यों के उद्देश्यों को स्पष्ट और सटीक रखने की प्रेरणा देता है।