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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।6.41।।तो फिर इस योगभ्रष्टका क्या होता है योगमार्गमें लगा हुआ योगभ्रष्ट संन्यासी पुण्यकर्म करनेवालोंके अर्थात् अश्वमेध आदि यज्ञ करनेवालोंके लोकोंमें जाकर वहाँ बहुत कालतक अर्थात् अनन्त वर्षोंतक वास करके उनके भोगका क्षय होनेपर शास्त्रोक्त कर्म करनेवाले शुद्ध और श्रीमान् पुरुषोंके घरमें जन्म लेता है। प्रकरणकी सामर्थ्यसे यहाँ योगभ्रष्टका अर्थ संन्यासी लिया गया है।