Sbg 6.40 htshg

From IKS BHU
Revision as of 12:02, 4 December 2025 by imported>Vij (Added {content_identifier} content)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।6.40।।श्रीभगवान् बोले हे पार्थ उस योगभ्रष्ट पुरुषका इस लोकमें या परलोकमें कहीं भी नाश नहीं होता है। पहलेकी अपेक्षा हीनजन्मकी प्राप्तिका नाम नाश है सो ऐसी अवस्था योगभ्रष्टकी नहीं होती। क्योंकि हे तात शुभ कार्य करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको अर्थात् नीच गतिको नहीं पाता। पिता पुत्ररूपसे आत्माका विस्तार करता है अतः उसको तात कहते हैं तथा पिता ही पुत्ररूपसे उत्पन्न होता है अतः पुत्रको भी तात कहते हैं। शिष्य भी पुत्रके तुल्य है इसलिये उसको भी तात कहते हैं।