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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।6.37।।योगाभ्यासको स्वीकार करके जिसने इस लोक और परलोककी प्राप्तिके साधनरूप कर्मोंका तो त्याग कर दिया और योगसिद्धिका फल मोक्षप्राप्तिका साधन पूर्ण ज्ञान जिसको मिला नहीं ऐसे जिस योगीका चित्त अन्तकालमें योगमार्गसे विचलित हो गया हो उस योगीके नाशकी आशङ्का करके अर्जुन पूछने लगा हे कृष्ण जो साधक योगमार्गमें यत्न करनेवाला नहीं है परंतु श्रद्धासे अर्थात् आस्तिकबुद्धिसे युक्त है और अन्तकालमें जिसका मन योगसे चलायमान हो गया है वह चञ्चलचित्त भ्रष्ट स्मृतिवाला योगी योगकी सिद्धिको अर्थात् योगफलरूप पूर्ण ज्ञानको न पाकर किस गतिको प्राप्त होता है ।