Sbg 6.23 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।6.23।।यत्रोपरमते से लेकर यहाँतक समस्त विशेषणोंसे विशिष्ट आत्माका अवस्थाविशेषरूप जो योग कहा गया है उस योग नामक अवस्थाको दुःखोंके संयोगका वियोग समझना चाहिये। अभिप्राय यह कि दुःखोंसे संयोग होना दुःखसंयोग है उससे वियोग हो जाना दुःखोंके संयोगका वियोग है उस दुःखसंयोगवियोग को योग ऐसे विपरीत नामसे कहा हुआ समझना चाहिये। योगफलका उपसंहार करके अब दृढ़ निश्चयको और योगविषयक रुचिको भी योगका साधन बतानेके लिये पुनः प्रकारान्तरसे योगकी कर्तव्यता बतायी जाती है वह उपर्युक्त फलवाला योग बिना उकताये हुए चित्तसे निश्चयपूर्वक करना चाहिये। जिस चित्तमें निर्विण्णता ( उद्वेग ) न हो वह अनिर्विण्णचित्त है ऐसे अनिर्विण्ण ( न उकताये हुए ) चित्तसे निश्चयपूर्वक योगका साधन करना चाहिये यह अभिप्राय है।