Sbg 6.21 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।6.21।।तथा जो सुख अत्यन्त यानी अन्तसे रहित अनन्त है जो इन्द्रियोंकी कुछ भी अपेक्षा न करके केवल बुद्धिसे ही ग्रहण किया जानेयोग्य है जो इन्द्रियोंकी पहुँचसे अतीत है यानी जो विषयजनित सुख नहीं है ऐसे सुखको यह योगी जिस कालमें अनुभव कर लेता है जिस कालमें अपने स्वरूपमें स्थित हुआ यह ज्ञानी उसतत्त्वसे वास्तविक स्वरूपसे चलायमान नहीं होता विचलित नहीं होता।