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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।6.20।।इस प्रकार योगाभ्यासके बलसे वायुरहित स्थानमें रखे हुए दीपककी भाँति एकाग्र किया हुआ योगसाधनसे निरुद्ध किया हुआ सब ओरसे चञ्चलतारहित किया हुआ चित्त जिस समय उपरत होता है उपरतिको प्राप्त होता है। तथा जिस कालमें समाधिद्वारा अति निर्मल ( स्वच्छ ) हुए अन्तःकरणसे परम चैतन्य ज्योतिःस्वरूप आत्माका साक्षात् करता हुआ वह अपने आपमें ही संतुष्ट हो जाता है तृप्ति लाभ कर लेता है।