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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।6.18।।अब यह बतलाते हैं कि ( साधक पुरुष ) कब युक्त ( समाधिस्थ ) हो जाता है वशमें किया हुआ चित्त यानी विशेषरूपसे एकाग्रताको प्राप्त हुआ चित्त जब बाह्य चिन्तनको छोड़कर केवल आत्मामें ही स्थित होता है अपने स्वरूपमें स्थिति लाभ करता है। तब उस समय सब भोगोंकी लालसासे रहित हुआ योगी अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट समस्त भोगोंसे जिसकी तृष्णा नष्ट हो गयी है ऐसा योगी युक्त है समाधिस्थ ( परमात्मामें स्थितिवाला ) है ऐसे कहा जाता है।