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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।5.20।।क्योंकि निर्दोष और सम ब्रह्म ही आत्मा है इसलिये प्रिय वस्तुको प्राप्त करके तो हर्षित न हो अर्थात् इष्टवस्तु पाकर तो हर्ष न माने और अप्रिय अनिष्ट पदार्थके मिलनेपर उद्वेग न करे। क्योंकि देहमात्रमें आत्मबुद्धिवाले पुरुषको ही प्रियकी प्राप्ति हर्ष देनेवाली और अप्रियकी प्राप्ति शोक उत्पन्न करनेवाली हुआ करती है केवल उपाधिरहित आत्माका साक्षात् करनेवाले पुरुषको नहीं। कारण उसके लिये ( वास्तवमें ) प्रिय और अप्रियकी प्राप्ति असम्भव है। सब भूतोंमें आत्मा एक है सम है और निर्दोष है ऐसी संशयरहित बुद्धि जिसकी स्थिर हो चुकी है और जो मोह अज्ञानसे रहित है वह स्थिरबुद्धि ब्रह्मज्ञानी ब्रह्ममें ही स्थित है। अर्थात् वह कर्म न करनेवाला सर्व कर्मोंका त्यागी ही है।