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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।5.17।।जो प्रकाशित हुआ परमज्ञान है उस परमार्थतत्त्वमें जिनकी बुद्धि जा पहुँची है वे तद्बुद्धि हैं वह परब्रह्म ही जिनका आत्मा है वे तदात्मा हैं उस ब्रह्ममें ही जिनकी निष्ठादृढ़ आत्मभावनातत्परता है अर्थात् जो सब कर्मोंका संन्यास करके ब्रह्ममें ही स्थित हो गये हैं वे तन्निष्ठ हैं। वह परब्रह्म ही जिनका परम अयनआश्रय परमगति है अर्थात् जो केवल आत्मामें ही रत हैं वे तत्परायण हैं ( इस प्रकार ) जिनके अन्तःकरणका अज्ञान ज्ञानद्वारा नष्ट हो गया है एवं उपर्युक्त ज्ञानद्वारा संसारके कारणरूप पापादि दोष जिनके नष्ट हो चुके हैं ऐसे ज्ञाननिर्धूतकल्मष संन्यासी अपुनरावृत्तिको अर्थात् जिस अवस्थाको प्राप्त कर लेनेपर फिर देहसे सम्बन्ध होना छूट जाता है ऐसी अवस्थाको प्राप्त होते हैं।