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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।4.32।।इसी प्रकार उपर्युक्त बहुत प्रकारके यज्ञ ब्रह्मके यानी वेदके मुखमें विस्तृत हैं। वेदद्वारा ही सब यज्ञ जाननेमें आते हैं इसी अभिप्रायसे ब्रह्मके मुखमें विस्तारित हैं ऐसा कहा है। जैसे हम वाणीमें ही प्राणोंको हवन करते हैं इत्यादि ( इसी तरह अन्य सब यज्ञोंका भी वेदमें विधान है )। उन सब यज्ञोंको तू कर्मजकायिक वाचिक और मानसिक क्रियाद्वारा ही होनेवाले जान वे यज्ञ आत्मासे होनेवाले नहीं हैं क्योंकि आत्मा हलनचलन आदि क्रियाओंसे रहित है। सुतरां इस प्रकार जानकर तू अशुभसे मुक्त हो जायगा अर्थात् यह सब कर्म मेरेद्वारा सम्पादित नहीं हैं मैं तो निष्क्रिय और उदासीन हूँ इस प्रकार जानकर इस सम्यक् ज्ञानके प्रभावसे तू संसारबन्धनसे मुक्त हो जायगा।