Sbg 4.30 htshg

From IKS BHU
Revision as of 11:42, 4 December 2025 by imported>Vij (Added {content_identifier} content)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।4.30।।तथा अन्य कितने ही नियताहारी अर्थात् जिनका आहार नियमित किया हुआ है ऐसे परिमित भोजन करनेवाले प्राणोंको यानी वायुके भिन्नभिन्न भेदोंको प्राणोंमें ही हवन किया करते हैं। भाव यह है कि वे जिसजिस वायुको जीत लेते हैं उसीमें वायुके दूसरे भेदोंको हवन कर देते हैं यानी वे सब वायुभेद उसमें विलीनसे हो जाते हैं। ये सभी पुरुष यज्ञोंको जाननेवाले और यज्ञोंद्वारा निष्पाप हो गये होते हैं अर्थात् उपर्युक्त यज्ञोंद्वारा जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं वे यज्ञक्षपितकल्मष कहलाते हैं।