Sbg 4.15 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।4.15।।मैं न तो कर्मोंका कर्ता ही हूँ और न मुझे कर्मफलकी चाहना ही है ऐसा समझकर ही पूर्वकालके मुमुक्षु पुरुषोंने भी कर्म किये थे। इसलिये तू भी कर्म ही कर। तेरे लिये चुपचाप बैठ रहना या संन्यास लेना यह दोनों ही कर्तव्य नहीं है। क्योंकि पूर्वजोंने भी कर्मका आचरण किया है इसलिये यदि तू आत्मज्ञानी नहीं है तब तो अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये और यदि तत्त्वज्ञानी है तो लोकसंग्रहके लिये जनकादि पूर्वजोंद्वारा सदासे किये हुए (प्रकारसे ही ) कर्म कर नये ढंगसे किये जानेवाले कर्म मत कर।