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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।3.36।।अर्जुन बोला यद्यपि ध्यायतो विषयान् पुंसः रागद्वेषौ ह्यस्य परिपन्थिनौ इत्यादि प्रकरणोंमें अनर्थका मूल कारणबतलाया गया पर वह भिन्नभिन्न प्रकरणोंमें और अनिश्चितरूपसे कहा गया है। इसलिये वह अनर्थोंका कारण ठीक यही है। इस प्रकार निश्चयपूर्वक और संक्षेपसे जाननेमें आ जाय तो मैं उसके उच्छेदके लिये प्रयत्न करूँ इस विचारसे उसके जाननेकी इच्छा करता हुआ अर्जुन बोला हे वृष्णिकुलमें उत्पन्न हुए कृष्ण किस प्रधान कारणसे प्रयुक्त किया हुआ यह पुरुष स्वयं न चाहता हुआ भी राजासे प्रयुक्त किये हुए सेवककी तरह बलपूर्वक लगाया हुआसा पापकर्मका आचरण किया करता है। जिसको तू पूछता है सर्व अनर्थोंके कारणरूप उस वैरीके विषयमें सुन ( इस उद्देश्यसे ) भगवान् बोले आचार्य पहले भगवान् शब्दका अर्थ करते हैं। सम्पूर्ण ऐश्वर्य धर्म यश लक्ष्मी वैराग्य और मोक्ष इन छःका नाम भग है यह ऐश्वर्य आदि छहों गुण बिना प्रतिबन्धके सम्पूर्णतासे जिस वासुदेवमें सदा रहते हैं। तथा उत्पत्ति और प्रलयको भूतोंके आने और जानेको एवं विद्या और अविद्याको जो जानता है उसका नाम भगवान् है अतः उत्पत्ति आदि सब विषयोंको जो भलीभाँति जानते हैं वे वासुदेव भगवान् नामसे वाच्य हैं।