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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।3.29।।परंतु जो प्रकृतिके गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए पुरुष हम अमुक फलके लिये यह कर्म करते हैं इस प्रकार गुणोंके कर्मोंमें आसक्त होते हैं। उन पूर्णरूपसे न समझनेवाले कर्मफलमात्रको ही देखनेवाले और कर्मोंमें आसक्त मन्दबुद्धि पुरुषोंको अच्छी प्रकार समस्त तत्त्वको समझनेवाला आत्मज्ञानी पुरुष स्वयं चलायमान न करे। अभिप्राय यह कि बुद्धिभेद करना ही उनको चलायमान करना है सो न करे।