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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।3.25।।यदि मेरी तरह तू या दूसरा कोई कृतार्थबुद्धि आत्मवेत्ता हो तो उसको भी अपने लिये कर्तव्यका अभाव होनेपर भी केवल दूसरोंपर अनुग्रह ( करनेके लिये कर्म ) करना चाहिये हे भारत इस कर्मका फल मुझे मिलेगा इस प्रकार कर्मोंमें आसक्त हुए कई अज्ञानी मनुष्य जैसे कर्म करते हैं आत्मवेत्ता विद्वान्को भी आसक्तिरहित होकर उसी तरह कर्म करना चाहिये। आत्मज्ञानी उसकी तरह कर्म क्यों करता है सो सुन वह लोकसंग्रह करनेकी इच्छावाला है ( इसलिये करता है )।