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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।2.41।।जो यह बुद्धि सांख्यके विषयमें कही गयी है और जो योगके विषयमें अब कही जानेवाली है वह
हे कुरुनन्दन इस कल्याणमार्गमें व्यवसायात्मिका निश्चय स्वभाववाली बुद्धि एक ही है यानि यथार्थ प्रमाणजनित होनेके कारण अन्य विपरीत बुद्धियोंके शाखाभेदोंकी बाधक है।
जो इतर ( दूसरी ) बुद्धियाँ हैं जिनके शाखाभेदके विस्तारसे संसार अनन्त अपार और अनुपरत होता है अर्थात् निरन्तर अत्यन्त विस्तृत होता है उन अनन्त भेदोंवाली बुद्धियोंका प्रमाणजनित विवेकबुद्धिके बलसे अन्त हो जानेपर संसारका भी अन्त हो जाता है।
परंतु जो अव्यवसायी हैं जो प्रमाणजनित विवेकबुद्धिसे रहित हैं उनकी वे बुद्धियाँ बहुत शाखा अर्थात् बहुत भेदोंवाली और प्रतिशाखाभेदसे अनन्त होती हैं।