Sbg 2.31 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।2.31।।यहाँ यह कहा गया कि परमार्थतत्त्वकी अपेक्षासे शोक या मोह करना नहीं बन सकता। केवल इतना ही नहीं कि परमार्थतत्त्वकी अपेक्षासे शोक और मोह नहीं बन सकते किंतु
क्षत्रियके लिये जो युद्धरूप स्वधर्म है उसे देखकर भी तुझे कम्पित होना उचित नहीं है अभिप्राय यह कि अपने स्वाभाविक धर्मसे विचलित होना ( हटना ) भी तुझे उचित नहीं है।
क्योंकि वह युद्ध पृथ्वीविजयद्वारा धर्मपालन और प्रजारक्षणके लिये किया जाता है इसलिये धर्मसे ओतप्रोत परम धर्म्य है अतः उस धर्ममय युद्धके सिवा दूसरा कुछ क्षत्रियके लिये कल्याणप्रद नहीं है।