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अवतरण
अस्य सामान्यवचनस्यार्थविभागः ? -
इस अष्टम सूत्र में पूर्व पक्षी के मत के सामान्य रूप से उक्ति के अर्थ का यह विभाग ( व्याख्या ) है -
सूत्र
पूर्वहि प्रमाणसिद्धौ नेन्द्रियार्थसन्निकर्षात्प्रत्यक्षोत्पत्तिः 2/1/9
पदच्छेद
पूर्व, हि, प्रमाणसिद्धौ, न, इन्द्रियार्थसन्निकर्षात, प्रत्यक्षोत्पत्तिः।
पदपदार्थ
| संख्या | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | पूर्व | प्रमेय के पूर्वकाल में |
| 2 | हि | क्योंकि |
| 3 | प्रमाणसिद्धौ | प्रत्यक्षादि प्रमाणों को सिद्धि मानने पर |
| 4 | न | नहीं होगी |
| 5 | इन्द्रियार्थसन्निकर्षात् | इन्द्रिय तथा पदार्थ के संयोग सम्बन्ध रूप सन्निकर्ष से |
| 6 | प्रत्यक्षोत्पत्तिः | प्रत्यक्ष की उत्पत्ति होती है |
सूत्रकार
"ज्ञान होता है 'प्रमाण'। उसके सम्बन्ध से 'प्रमेय' 'अर्थ' है यह कहा जाता है। अतः यदि प्रत्यक्ष नामक प्रमाण प्रमेय (अर्थ) से पूर्वकाल में उत्पन्न होता है तो प्रमाण से पूर्वकाल में वह पदार्थ न होने के कारण 'इन्द्रिय तथा पदार्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न होने वाले ज्ञान को प्रत्यक्ष कहते हैं' ऐसा प्रथम अध्याय में वर्णन किया हुआ सिद्धान्ती का प्रत्यक्ष का लक्षण नहीं हो सकता
भाष्यकार
(नवम पूर्वपक्षी के सूत्र की भाष्यकार व्याख्या करते हैं कि) - "गन्ध, रूप आदिकों को विषय करने वाले ज्ञान को प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं, वह यदि प्रमेय पदार्थ के पूर्वकाल में हो, और उसके पश्चात् गन्धादि विषयों की सिद्धि होती हो तो वह प्रमाण के पूर्वकाल में गन्धादि विषयों के न होने के कारण इन्द्रिय तथा गन्धरूप विषय के संयुक्त संयोगरूप सन्निकर्ष से उत्पन्न नहीं हो सकता, इस कारण प्रमेय के पूर्वकाल में प्रमाण को नहीं मान सकते